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Taarif Shayari
क्यों बार बार देखती हो शीशे
क्यों बार बार देखती हो शीशे
क्यों बार बार देखती हो शीशे को तुम
नजर लगाओ गी क्या मेरी इकलोती मोहोबत को
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जी भर कर जुल्म कर लोक्या
इक आग का दरिया हैं मोजों
तेरी आँखों के सिवा दुनियाँ में
दिल तोडना इन हसीनो को खूब
तुम्हें देखकर किसी को भी यकीन
बस एक बार आ के अपना
नजरे झुका कर चलती है कंगन
यूँ ही शौक़ है हमारा तो
मैं वो हूँ जो कहता था
Uski jeet se hoti he khushi
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