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Taarif Shayari
क्यों बार बार देखती हो शीशे
क्यों बार बार देखती हो शीशे
क्यों बार बार देखती हो शीशे को तुम
नजर लगाओ गी क्या मेरी इकलोती मोहोबत को
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खामोश हूँ सिर्फ़ तुम्हारी खुशी के
रहने दे ना अपने इन लबो
कोई बुलबुल है कोई तितली है
Mujh ko maloom nahi husn ki
Shukar hai uska jo apni yaden
गुलाम हूँ अपने घर के संस्कारो
तस्वीर बना कर तेरी आस्मां पे
मेरे किरदार का फैसला मेरे लफ़्ज़ों
सब तेरी मोहब्बत की इनायत है
ज़र्रा ज़र्रा जल जाने को हाज़िर
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