तू वो ज़ालिम है जो दिल में रह कर भी मेरा ना बन सका ग़ालिब
और दिल वो काफिर है जो मुझ में रह कर भी तेरा हो गया

उसे मेरी शायरी पसंद आई क्यों की इनमे दर्द था
न जाने क्यों मै पसंद नहीं आया मुझमे उससे ज्यादा दर्द था

तुम छोड़ गये मुझको पर मैं बदल ना पाया आदतें
बस तुम्हें ही सोचना तुम्हें ही चाहना मेरा आज भी जुनून है

तुम क्या जानो हम अपने आप में कितने अकेले हैं .
पूछो उन रातों से जो रोज़ कहती हैं खुदा के लिए आज तो सो जाओ..!!

दर्द इतना था ज़िंदगी में कि धड़कन साथ देने से घबरा गयी
आंखें बंद थी किसी कि याद में ओर मौत धोखा खा गयी

शिकायत रोज़ करता हूँ कि तू मिली नहीं मुझको
मगर फिर याद आ जाता है कि खुद को तेरे काबिल बना ही नहीं पाया

उम्र में,ओहदे में, कौन कितना
बड़ा है, फर्क नही पड़ता ।
लहजे में, कौन कितना
झुकता है, फर्क ये पड़ता है।। Er kasZ

मोबाइल के एक फोल्डर में तेरी तस्वीरें इकठ्ठा की है मैंने
बस इसके सिवा और ख़ास कुछ जायदाद नहीं है मेरी

तू कल की तरह आज नहीँ साथ मेरे तो क्या हुआ
कैसे बताऊँ तुझे कि मोहब्बत तो हम तेरी दुरीयोँ से भी करतेँ हैँ

नीलाम कुछ इस कदर हुए, बाज़ार-ए-वफ़ा में हम आज,
बोली लगाने वाले भी वो ही थे, जो कभी झोली फैला कर माँगा करते थे!! Er kasz

रहते है वो किसी की याद में या आता है कोई उनके ख्वाब में
पर यक़ीनन इतना हसीन मुकाम नही लिखा हमारे नसीब में

अगर कुछ बनना है तो गुलाब बनो,
क्यों की ये फूल उसके हाथ में भी खुशबू छोड़ देता है,
जो इसे मसल कर फेक देता है,

माना कि बहुत ख़ास हूँ मैं कुछ लोगो के लिए
लेकिन चन्द लम्हों से ज्यादा कोई ना रोयेगा मेरे गुजर जाने के बाद

नाराज़ क्यों होते हो यार चले जायेंगे तेरी महफ़िल से
जहाँ कोई जान के अनजान हो जाए वहाँ हम रुका करते भी नहीं!

नाम तो लिख दूँ उसका अपनी हर शायरी के साथ
मगर फिर ख्याल आता है मासूम सा है सनम मेरा कहीं बदनाम ना हों जाये…