अभी लिखी है गज़ल तो अभी दीजिये दाद़
वो कैसी तारीफ जो मिले मौत के बाद

अनजान अपने आप से वह शख्स रह गया
जिसने उमर गुज़ार दी औरों की फ़िक्र में..

“थक गया हूँ तेरी नौकरी से ऐ जिन्दगी...
मुनासिब होगा कि अब मेरा हिसाब कर दे...!!” Er kasz

है कौन सा ये शहर जहां कोई न हमसफर
बस्तियों में गुल खिले हैं, पर खुशबू है बेअसर
er kasz

जी भर कर जुल्म कर लो......
क्या पता मेरे जैसा कोई बेजुबान तुम्हें फिर मिले ना मिल*::*""!! Er kasz

याद आयेगी मेरी तो बीते कल को पलट लेना
यूँ ही किसी पन्ने में मुस्कुराता हुआ मिल जाऊंगा
Er kasz

मैं जानता हूँ मेरी खुद्दारियां तुझे खो देंगी लेकिन
मैं क्या करूँ मुझ को मांगने से नफ़रत है
Er kasz

Vo samjh hi na sake mere dardo ko
Hame lagga unhe dikhta nahi
Shayad unhe padhna Bhi nahi atta
Er kasz

इंतजार की और क्या हद होगी
हमारी तो आँखे भी खुली रही मरने के बाद
er kasz

वहा तक तो साथ चल जहा तक मुमकीन है।
जहा हालात बदल जाये तुम भी बदल जाना
Er kasz

बुरी आदतें अगर, वक़्त पे ना बदलीं जायें
तो वो आदतें, आपका वक़्त बदल देती हैं

अपनी जवानी में और रखा ही क्या है कुछ तस्वीरें यार
की बाकी बोतलें शराब की
Er kasz

तुझको खबर नहीं मगर एक बात सुन ले..!!
बर्बाद कर दिया तेरे दौ दिन के प्यार ने !! 😌😌 Er kasz

मार दो एक दफ़ा ही नशीला सा कुछ खिला के
क्यूँ जहर दे रहे हो मोहब्बत मिला मिला के

मुमकिन है कि तेरे बाद भी आती होंगी बहारें
गुलशन में तेरे बाद कभी जा कर नहीं देखा