शेर हर कोई नही होता
क्यों की शेर नाम से नही काम से जाना जाता है
G.R..s

जनाजा उठा है आज कसमों का मेरी
एक कन्धा तो तेरे वादों का भी बनता है

बना कर छोड़ देते हैं अपनी ज़ात का आदि
कुछ लोग यूँ भी इंतकाम लेते हैं

मत पूछ दास्तान ऐ इश्क
जो रूलाता है, उसी के गले लगकर रोने का मन करता है

सम्भाल के रखना अपनी पीठ को...
शाबाशी " और " खंजर "दोनों वहीं मिलते है ...Er kasz

मंजिल का नाराज होना भी जायज था
हम भी तो अजनबी राहों से दिल लगा बैठे थे

खामोशियाँ उदासियों की वजह से नहीं,
बल्कि यादों की वजह से हुआ करती हैं..

हमें रोता देखकर वो ये कह के चल दिए कि
रोता तो हर कोई है क्या हम सब के हो जाएँ

पतंग सी हैं जिंदगी, कहाँ तक जाएगी
रात हो या उम्र, एक ना एक दिन कट ही जाएगी
er kasz

ऐसे कुछ दिन भी मेरी जिंदगी ने पाए हैं
आंखें जब रोती रहीं होंठ मुस्कराए हैं

मुझे अपने लफ़्जो से आज भी शिकायत है
ये उस वक़त चुप हो गये जब इन्हें बोलना था

उम्र भर उठाया बोझ दीवार पर लगी उस कील ने .......
और लोग तारीफ़ तस्वीर की करते रहे ... Er kasz

मुनासिब समझो तो सिर्फ इतना ही बता दो
दिल बेचैन है बहुत,कहीं तुम उदास तो नहीं...

तेरा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से
कोई भी लफ्ज लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती है

कौन कहता है कि आंसुओं में वज़न नही होता
एक भी छलक जाता है तो मन हल्का हो जाता है