सम्भाल के रखना अपनी पीठ को...
शाबाशी " और " खंजर "दोनों वहीं मिलते है ...Er kasz

मंजिल का नाराज होना भी जायज था
हम भी तो अजनबी राहों से दिल लगा बैठे थे

खामोशियाँ उदासियों की वजह से नहीं,
बल्कि यादों की वजह से हुआ करती हैं..

उम्र कैद की तरह होते हैं कुछ रिश्ते जहा जमानत देकर भी रिहाई मुमकिन नही ! Er kasz

मैं भी तेरे ईश्क में आतंकवादी बन जाऊं
तुझे बांहो में ले के बम से उड़ जाऊ

हमें रोता देखकर वो ये कह के चल दिए कि
रोता तो हर कोई है क्या हम सब के हो जाएँ

पतंग सी हैं जिंदगी, कहाँ तक जाएगी
रात हो या उम्र, एक ना एक दिन कट ही जाएगी
er kasz

अमीर होता तो बाज़ार से खरीद लाता नकली
गरीब हूँ इसलीये दिल असली दे रहा हु
Er kasz

मुझे अपने लफ़्जो से आज भी शिकायत है
ये उस वक़त चुप हो गये जब इन्हें बोलना था

उम्र भर उठाया बोझ दीवार पर लगी उस कील ने .......
और लोग तारीफ़ तस्वीर की करते रहे ... Er kasz

मुनासिब समझो तो सिर्फ इतना ही बता दो
दिल बेचैन है बहुत,कहीं तुम उदास तो नहीं...

तेरा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से
कोई भी लफ्ज लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती है

कौन कहता है कि आंसुओं में वज़न नही होता
एक भी छलक जाता है तो मन हल्का हो जाता है

मयखाने से पूछा आज इतना सन्नाटा क्यों है
बोला साहब लहू का दौर है शराब कौन पीता है
Er kasz

प्यार मोहब्बत आशिकी..
ये बस अल्फाज थे..
मगर.. जब तुम मिले..
तब इन अल्फाजो को मायने मिले !!
•• Er kasz