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Dard Shayari
जिस के होने से मैं खुद
जिस के होने से मैं खुद
जिस के होने से मैं खुद को मुक्कमल मानता हूँ
मेरे रब के बाद मैं बस मेरी माँ को जानता हूँ
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चलो अब जाने भी दो क्या
अब उस नासमझ को समझाना छोड़
हम तो फिरते थे उसकी तस्वीर
मुझे अपने किरदार पे इतना तो
हम उनसे तो लड़ सकते हैं
उज़ड़ जाते है सर से पाव
पतंग सी हैं जिंदगी कहाँ तक
कितनी फिकर है क़ुदरत को मेरे
काफिला खुशबू का गुजरा हैतुम कहीं
एक सपने के टूटकर चकनाचूर हो
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