कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल कब रात बसर होगी; सुनते थे वो आयेंगे सुनते थे सहर होगी; कब जान लहू होगी कब अश्क गुहार होगा; किस दिन तेरी शनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी; कब महकेगी फसले-गुल कब बहकेगा मयखाना; कब सुबह-ए-सुखन होगी कब शाम-ए-नज़र होगी; वाइज़ है न जाहिद है नासेह है न क़ातिल है; अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी; कब तक अभी रह देखें ऐ कांटे-जनाना; कब अश्र मुअय्यन है तुझको तो ख़बर होगी।

वो कभी मिल जाएँ तो... वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए; रात दिन सूरत को देखा कीजिए; चाँदनी रातों में एक एक फूल को; बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए; जो तमन्ना बर न आए उम्र भर; उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए; इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर; चाँदनी रातों में रोया कीजिए; हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे; क्यों किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए; कहते हैं अख़्तर वो सुन कर मेरे शेर; इस तरह हम को न रुसवा कीजिए।

​मुझसे मिलने को​...​ मुझसे मिलने को करता था वो बहाने कितने; अब मेरे बिना गुजरेगा वो जमाने कितने; मैं गिरा था तो रुके थे बहुत लोग;​ सोचता हूँ उनमें से आए थे उठाने कितने;​​​​ ​अब और न दे दर्द मेरे दिल को ज़ालिम;​ भरे नहीं अभी तक जख्म पुराने कितने।

यूं न मिल मुझ से ​...​ यूं न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे​;​​ साथ चल मौज-ए-सबा हो जैसे​;​​ लोग यूं देख के हंस देते हैं;​ तू मुझे भूल गया हो जैसे​;​ इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा​;​ यूं न छुप हम से ख़ुदा हो जैसे​;​​​​ मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ​;​​ मुझ पे अहसान किया हो जैसे।

ज़िन्दगी से यही ग़िला... ज़िन्दगी से यही ग़िला है मुझे; तू बहुत देर से मिला है मुझे; हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं; मुसाफ़िर ही काफ़िला है मुझे; दिल धड़कता नहीं सुलगता है; वो जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे; लबकुशा हूँ तो इस यक़ीन के साथ; क़त्ल होने का हौसला है मुझे; कौन जाने कि चाहतों में फ़राज़ ; क्या गँवाया है क्या मिला है मुझे।

न सोचा न समझा... न सोचा न समझा न सीखा न जाना; मुझे आ गया ख़ुदबख़ुद दिल लगाना; ज़रा देख कर अपना जल्वा दिखाना; सिमट कर यहीं आ न जाये ज़माना; ज़ुबाँ पर लगी हैं वफ़ाओं कि मुहरें; ख़मोशी मेरी कह रही है फ़साना; गुलों तक लगायी तो आसाँ है लेकिन; है दुशवार काँटों से दामन बचाना; करो लाख तुम मातम-ए-नौजवानी; प मीर अब नहीं आयेगा वो ज़माना।

हर एक चेहरा यहाँ पर गुलाल होता है; हमारे शहर में पत्थर भी लाल होता है; मैं शोहरतों की बुलंदी पर जा नहीं सकता; जहाँ उरूज पर पहुँचो ज़वाल होता है; मैं अपने बच्चों को कुछ भी तो दे नहीं पाया; कभी-कभी मुझे ख़ुद भी मलाल होता है; यहीं से अमन की तबलीग रोज़ होती है; यहीं पे रोज़ कबूतर हलाल होता है; मैं अपने आप को सय्यद तो लिख नहीं सकता; अजान देने से कोई बिलाल होता है; पड़ोसियों की दुकानें तक नहीं खुलतीं; किसी का गाँव में जब इन्तिकाल होता है।

जागती रात अकेली... जागती रात अकेली-सी लगे; ज़िंदगी एक पहेली-सी लगे; रुप का रंग-महल ये दुनिया; एक दिन सूनी हवेली-सी लगे; हम-कलामी तेरी ख़ुश आए उसे; शायरी तेरी सहेली-सी लगे; मेरी इक उम्र की साथी ये ग़ज़ल; मुझ को हर रात नवेली-सी लगे; रातरानी सी वो महके ख़ामोशी; मुस्कुरादे तो चमेली-सी लगे; फ़न की महकी हुई मेंहदी से रची; ये बयाज़ उस की हथेली-सी लगे।

करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे... करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे; गज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे; वो ख़ार-ख़ार है शाख-ए-गुलाब की मानिंद; मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे; ये लोग तज़किरे करते हैं अपने प्यारों के; मैं किससे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे; जो हमसफ़र सरे मंज़िल बिछड़ रहा है फ़राज़ ; अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे।

किसी बे दर्द ने... किसी बे दर्द ने यूँ मेरा दिल तोड़ दिया; मेरी आदत बिगाड़ कर साथ छोड़ दिया; हद तो देखो उसके दिलकश फरेब की; मंज़िल दिखा कर राह को मोड़ दिया; पुराने ज़ख्म छेड़ देती है हर रात; उसने हर दिन नया एक गम जोड़ दिया; महल ​अरमानों का मुश्किल से बना; उसने हर लम्हा एक शीशा तोड़ दिया; बेवफा दुनियाँ से ताज कभी नहीं हारी; मगर तूने मेरी रूह तक को झिंझोड़ दिया।

मुझ पर नहीं उठे हैं​...​​ ​ ​ मुझ पर नहीं उठे हैं तो उठकर कहाँ गए​​;​​ मैं शहर में नहीं था तो पत्थर कहाँ गए​​;​​​ ​​​ मैं खुद ही मेज़बान हूँ मेहमान भी हूँ ख़ुद​​;​​ सब लोग मुझको घर पे बुलाकर कहाँ गए​​;​​​ ​ ये कैसी रौशनी है कि एहसास बुझ गया​​;​ ​ हर आँख पूछती है कि मंज़र कहाँ गए​​;​​​​​​ ​ पिछले दिनों की आँधी में गुम्बद तो गिर चुका​​;​अल्लाह जाने सारे कबूतर कहाँ गए​।

तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार... तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार जब से है; न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है; किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म; गिला है जो भी किसी से तेरी सबब से है; हुआ है जब से दिल-ए-नासबूर बेक़ाबू; कलाम तुझसे नज़र को बड़ी अदब से है; अगर शरर है तो भड़के जो फूल है तो खिले; तरह तरह की तलब तेरे रंग-ए-लब से है; कहाँ गये शब-ए-फ़ुरक़त के जागने वाले; सितारा-ए-सहर हम-कलाम कब से है।

कोई तो फूल खिलाए... कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में; अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में; ये वक़्त किस की रुऊनत पे ख़ाक डाल गया; ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में; न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है; हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में; खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है; अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में; यही है मसलहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर; हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में।

आज फिर दिल ने कहा... ​आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दे यादें; जिंदगी बीत गई और वही यादे-यादें; जिस तरह आज ही बिछड़े हो बिछड़ने वाले; जेसे एक उम्र के दुःख याद दिला दे यादें; काश मुमकिन हो कि इक कागजी कश्ती की तरह; खुद फरामोशी के दरिया में बहा दे यादें; वो भी रुत आये कि ए-जुद-फरामोश मेरे; फूल पते तेरी यादों में बिछा दे यादें; भूल जाना भी तो इक तरह की नेअमत है फ़राज ; वरना इंसान को पागल न बना दे यादें।

​दिन सलीके से उगा... दिन सलीके से उगा रात ठिकाने से रही; दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही; चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखे; जिंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही; इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी; रात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही; फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को; दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही; शहर में सबको कहाँ मिलती है रोने की जगह; अपनी इज्ज़त भी यहाँ हंसने-हंसाने से रही।