तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे; मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे; तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ हमें; तुम्हें भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे!

जो फिर आज खुद को तेरी निगाहों से देखा
बचपन में फेंका वो अजीज़ खिलौना याद आ गया

बादलों के दरमियान कुछ ऐसी साज़िश हुई; मेरा मिटटी का घर था वहां ही बारिश हुई; फ़लक को आदत थी जहाँ बिजलियाँ गिराने की; हमको भी जिद्द थी वहां आशियाना बनाने की!

हमें क्या पता था मौसम ऐसे रो पड़ेगा; हमने तो आसमां को बस अपनी दास्ताँ सुनाई थी।

ये मत पूछ के एहसास की शिद्दत क्या थी; धूप ऐसी थी के साए को भी जलते देखा।

मजबूरियॉ ओढ के निकलता हूं घर से आजकल वरना शौक तो आज भी है बारिशों में भीगनें का

तब्दीली जब भी आती है मौसम की अदाओं में; किसी का यूँ बदल जाना बहुत याद आता है।

बदलना आता नहीं हम को मौसमों की तरह हर एक रूप में तेरा इंतज़ार करते हैं! न तुम समेट सकोगी जिसे कयामत तक कसम तुम्हारी तुम्हें इतना प्यार करते हैं!

खुद को चुनते हुए दिन सारा गुज़र जाता है; फिर हवा शाम की चलती है बिखर जाती हूं!

आज फिर मौसम नम हुआ मेरी आँखों की तरह! शायद कही बादलों का भी किसी ने दिल तोडा है!

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी; ऐसा तो कम ही होता है वो भी हो तनहाई भी! गुलज़ार

लोग कहते है दिल पत्थर है मेरा; इसलिए इसे पिघलना नही आता! अब क्या कहूँ क्या आता है क्या नही आता; बस मुझे मौसम की तरह बदलना नही आता!

ye mausam b hume itni appeal deta hai aaahh kerne ki bas hume or une milne ka intezar hota hai monsoon ke season me

तपिश और बढ़ गई इन चंद बूंदों के बाद; काले सियाह बादल ने भी बस यूँ ही बहलाया मुझे!

दुआ बारिश की करते हो मगर छतरी नहीं रखते; भरोसा है नहीं तुमको खुदा पर क्या जरा सा भी।