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मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे
मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे
मेरी काबिलियत को तुम क्या परखोगे ए गालिब
इतनी छोटी सी उमर मेँ ही लाखो दुश्मन बना रखे हैं
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जाते वक्त बहोत गुरूर से कहा
नजरे मेरी थक न जायेतेरा इंतजार
जिस तरह ये दर्द मेरे हैकाश
अच्छा हुआ तूने ठुकरा दिया मुझेप्यार
एहसान ऐसा तलख जवाबएवफ़ा मिला; हम
एक लम्हें में ही दम तोड़
फोटो तो हम अपने शोक के
आज किसी की दुआ की कमी
अधूरी हसरतों का आज भी इलज़ाम
समझ न सके उन्हें हमक्योकि हम
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