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Narazgi Shayari
गिलेसिकवे में उलझ कर रह गयी
गिलेसिकवे में उलझ कर रह गयी
गिले-सिकवे में उलझ कर रह गयी मौहब्बत अपनी
समझ में नही आता मौहब्बत चल रही थी या कोई
मुकदमा..
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कश्ती मोहब्बत की ले के निकले
सुबह हुई कि छेडने लगा है
अपनी आदतों के अनुसार चलने में
तुमसे किसने कह दिया की मोहब्बत
कहानी खत्म हो तो कुछ ऐसे
अभी तो जरा वक़्त है उनका
बहल तो जायेगा उसके वादों से
अजीब था उनका अलविदा कहनासुना कुछ
भीड़ में भी महसूस होती है
हम बने थे तबाह होने के
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