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Shubh Kamnaye
खींचती है मुझे कोई कशिश उसकी
खींचती है मुझे कोई कशिश उसकी
खींचती है मुझे कोई कशिश उसकी तरफ; वरना मैं बहुत बार मिला हूँ आखरी बार उससे!
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तेरे हुस्न को परदे की ज़रूरत
सोचा था इस कदर उनको भूल
दिल अजब शहर था ख्यालों का;
ये किसका ढलक गया है आंचल;
कितने नाज़ुक मिजाज़ हैं वो कुछ
तुम्हारा नूर ही है जो पड़
आफ़त तो है वो नाज़ भी
तरस गए आपके दीदार को फिर
आपके दीदार को निकल आये हैं
हम तो फना हो गए उनकी
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