मेरी कहानी खत्म हो तो कुछ ऐसे खत्म हो की
लोग रोने लगे मेरे लिए तालियाँ बजाते बजाते

ज़माने से लड़ी तूने ज़ंग कोई जब जब मैं तेरे साथ खड़ी थी तब तब
खुद मैं तुझ संग ज़ंग लड़ूं कैस

दुश्मनी जम कर करो लेकिन इतनी गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा कोई न हो

सोने लगा हूँ तुझे ख़्वाब में देखने की हसरत ले कर
दुआ करना कोई जगा न दे तेरे दीदार से पहले

वो फिर से लौट आये थे मेरी जिंदगी मे अपने मतलब के लिये
और हम सोचते रहे की हमारी दुआ में दम था

गुज़ारिशें थक न जायें कहीं मिन्नते करते
करते....!!
कभी तो दुआ की तरह आकर तुम थाम लो
मुझको....!!

न लफ़्ज़ों का लहू निकलता है न किताबें बोल पाती हैं
मेरे दर्द के थे दो गवाह दोनों बे-जुबान निकले

दूसरों को इतनी जल्दी माफ़ कर दिया करो
जितनी जल्दी आप उपरवाले से अपने लिए माफ़ी की उम्मीद रखते हो

कई रास्तों पर चलकर देखा सब जा पहुंचे उसी पड़ाव पर
न गुजरे जो उस पड़ाव से मिल जाए तो चलूँ उस रास्ते पर

ऐ ख़ुदा सुना है के दुआ कुबूल करने का तेरा एक वक़्त होता है
अब तू ही बता मैंने उसे किस वक़्त नहीं माँगा

उसने तो कर ही लिए किनारे कामिल से कुछ इस कदर
तदबीरें सकून की सीखनी पढ़ें किन्ही गैरों से ख़ुदा न करे

बहुत रोये थे हम उस दिन जब एहसास हुआ था, खंजर लगा एक पीठ पर
आज लहुलुहान पीठ लेकर भी चुपचाप चलते जा रहे

खिंच चुके है मासूम जो नकाब चेहरों से खुद ही गिर जाएँगे एक दिन
न बेकार समय गँवा कुछ सच्चे चेहरे तलाश

मिला है धोखा पूरा यकीं था उनके आँसुओं ने पर पैदा किया भ्रम था
भ्रम टूटा भी तो तब फिर जीना चाहने लगे थे जब

अपनों से करके किनारा राह के मुसाफिरों को अपना कहने वाला
मुड़ के आएगा जिस दिन बिखर चुका होगा तेरे अपनों का मेला