देश मेरा क्या बाजार हो गया है
पकड़ता हूँ जो तिरंगा हाथ में लोग पूछते हैं कितने का है
Er kasz

बडे अजीब है इस दुनिया में लोग
ये ऊपरवाले को तो एक मानते हैं लेकिन ऊपरवाले कि एक नही मानते

मेरी कबर पे वो रोने आये हैं; हम से प्यार है ये कहने आये हैं; जब ज़िंदा थे तो रुलाया बहुत; अब आराम से सोये हैं तो जगाने आये हैं।

वह कहता है पागल है वो तो; जो मेरी बातों को अपने दिल पर ले ​गई; मैंने तो कभी उसे अपना माना ही नहीं था; वो तो खुद-ब-खुद मेरी होकर रह गई।

ज़िन्दगी में हमेशा नए लोग मिलेंगे; कहीं ज्यादा तो कहीं कम मिलेंगे; ऐतबार ज़रा सोच समझ कर करना; मुमकिन नहीं हर जगह तुम्हें हम मिलेंगे।

..क्या दौर आया है-...
..बारिश का...और ...
..सोने की कीमत का...

.एक तरफ, कुछ अमीर लोग
""कितना सोना"" खरीदें...
.. ये सोच रहे हैं...
...और दूसरी तरफ,
...कुछ गरीब लोग...
""कहां सोना है"" ये सोच रहे हैं..

इतने कहाँ मशरूफ़ हो गए हो तुम; आजकल दिल तोड़ने भी नहीं आते!

दोस्ती किस से न थी किस से मुझे प्यार न था; जब बुरे वक़्त पे देखा तो कोई यार न था।

मेरे लफ़्ज़ों से न कर मेरे क़िरदार का फ़ैसला; तेरा वज़ूद मिट जायेगा मेरी हकीक़त ढूंढ़ते ढूंढ़ते।

अपना समझा तो कह दिया वरना; गैरों से तो कोई गिला नहीं होता; कुछ न कुछ पहले खोना पड़ता है; मुफ्त में तो कोई तज़ुर्बा नहीं मिलता।

तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर ये आज़माइश ना बार-बार होगी; मैं जानता हूं मुझे ख़बर है कि कल फ़ज़ा ख़ुशगवार होगी; रहे मोहब्बत में ज़िन्दगी भर रहेगी ये कशमकश बराबर; ना तुमको कुर्बत में जीत होगी ना मुझको फुर्कत में हार होगी; हज़ार उल्फ़त सताए लेकिन मेरे इरादों से है ये मुमकिन; अगर शराफ़त को तुमने छेड़ा तो ज़िन्दगी तुम पे वार होगी।

ये मंजिले मुझे रास आती नहीं ऐ रास्तो मुझे अपना हमसफ़र बना लो।

तहज़ीब में भी उसकी क्या ख़ूब अदा थी; नमक भी अदा किया तो ज़ख़्मों पर छिड़क कर।

हो मुखातिब तो कहूँ क्या मर्ज़ है मेरा; अब तुम ख़त में पूछोगे तो खैरियत ही कहेंगे।

वादा कर लेते हैं निभाना भूल जाते हैं; लगाकर आग बुझाना भूल जाते हैं; ये तो आदत हो गई है अब उनकी रोज़; कि रुलाते हैं और मनाना भूल जाते हैं।