हो मुखातिब तो कहूँ क्या मर्ज़ है मेरा; अब तुम ख़त में पूछोगे तो खैरियत ही कहेंगे।

तेरे शहर के कारीगर बड़े अजीब हैं ये खुसूस-ये-दिल; कांच की मरम्मत करते हैं पत्थर के औजारों से!

है किस्मत हमारी आसमान में चमकते सितारे जैसी; लोग अपनी तमन्ना के लिए हमारे टूटने का इंतज़ार करते हैं।

वादा कर लेते हैं निभाना भूल जाते हैं; लगाकर आग बुझाना भूल जाते हैं; ये तो आदत हो गई है अब उनकी रोज़; कि रुलाते हैं और मनाना भूल जाते हैं।

ना जाने कौन सी बात पर वो रूठ गयी है; मेरी सहने की हदें भी अब टूट गयी हैं; कहती थी जो कि कभी नहीं रूठेगी मुझसे; आज वो अपनी ही बातें भूल गयी है।

जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते; ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते; किस वास्ते लिखा है हथेली पे मेरा नाम; मैं हर्फ़ ग़लत हूँ तो मिटा क्यों नहीं देते।

..क्या दौर आया है-...
..बारिश का...और ...
..सोने की कीमत का...

.एक तरफ, कुछ अमीर लोग
""कितना सोना"" खरीदें...
.. ये सोच रहे हैं...
...और दूसरी तरफ,
...कुछ गरीब लोग...
""कहां सोना है"" ये सोच रहे हैं..

मुझे गुमान था कि चाहा बहुत सबने मुझे; मैं अज़ीज़ सबको था मगर ज़रूरत के लिए।

अब भी इल्जाम-ए-मोहब्बत है हमारे सिर पर; अब तो बनती भी नहीं यार हमारी उसकी।

हम आह भी भरते हैं तो बदनाम होते हैं; वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता!

ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया​;​कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए।

जिन के आंगन में अमीरी का शजर लगता है;​​​ उन का हर एब भी जमानें को हुनर लगता है।

चीखें भी यहाँ गौर से सुनता नहीं कोई; अरे किस शहर में तुम शेर सुनाने चले आये! फ़राज़

जब भी सुलझाना चाहा जिंदगी के सवालों को मैंने; हर एक सवाल में जिंदगी मेरी उलझती चली गई।

ये संगदिलों की दुनिया है; यहाँ संभल के चलना ग़ालिब; यहाँ पलकों पे बिठाया जाता है; नज़रों से गिराने के लिए।