अक्सर सूखे हुए होंठों से ही होती हैं मीठी बातें; प्यास बुझ जाये तो अल्फ़ाज़ और इंसान दोनों बदल जाया करते हैं।

सब फ़साने हैं दुनियादारी के किस से किस का सुकून लूटा है; सच तो ये है कि इस ज़माने में मैं भी झूठा हूँ तू भी झूठा है।

एक वफ़ा को पाने की कोशिश में; ज़ख़्मी होती हैं वफ़ाएं कितनी; कितना मासूम सा लगता है लफ्ज़ मोहब्बत; और इस लफ्ज़ से मिलती हैं सज़ाएं कितनी।

रास्ते में पत्थरों की कमी नहीं है; मन में टूटे सपनो की कमी नहीं है; चाहत है उनको अपना बनाने की मगर; मगर उनके पास अपनों की कमी नहीं है।

भुला के मुझको अगर तुम भी हो सलामत; तो भुला के तुझको संभलना मुझे भी आता है; नहीं है मेरी फितरत में ये आदत वरना; तेरी तरह बदलना मुझे भी आता है।

हमें उनसे कोई शिकायत नहीं; शायद हमारी ही किस्मत में चाहत नहीं; हमारी तक़दीर को लिख कर तो ऊपर वाला भी मुकर गया; पूछा जो हमने तो बोला यह मेरी लिखावट नहीं।

एक अजनबी से मुझे इतना प्यार क्यों है! इंकार करने पर चाहत का इकरार क्यों है! उसे पाना नहीं मेरी तकदीर में शायद! फिर भी हर मोड़ पर उसी का इन्तज़ार क्यों है!

वो जो हममें तुममें क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो; वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो; वह जो लुत्फ़ मुझपे थे पेश्तर वह करम कि था मेरे हाल पर; मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो।

एहसान जताना जाने कैसे सीख लिया; मोहब्बत जताते तो कुछ और बात थी।

सबको मालुम है की जिंदगी बेहाल है
फिर भी लोग पूछते है क्या हाल है

अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे; पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे।

उसे किसी की मोहब्बत का ऐतबार नहीं; उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है।

जरा सा भी नही पिघलता दिल तेरा; इतना क़ीमती पत्थर कहाँ से ख़रीदा है।

पत्थर कहा गया कभी शीशा कहा गया; दिल जैसी एक चीज़ को क्या-क्या कहा गया।

लेकर के मेरा नाम वो मुझे कोसता है; नफरत ही सही पर वो मुझे सोचता तो है।