ग़जब किया तेरे वादे पे एतबार किया; तमाम रात किया क़यामत का इंतज़ार किया।

मौजूद थी उदासी अभी तक पिछली रात की
बहला था दिल ज़रा सा की फिर रात हो गई

तमाम रात मेरे घर का एक दर खुला रहा; मैं राह देखती रही वो रास्ता बदल गया।

मेरी ख़बर तो किसी को नहीं मगर अख़्तर ; ज़माना अपने लिए होशियार कैसा है।

मेरी ख़बर तो किसी को नहीं मगर अख़्तर ; ज़माना अपने लिए होशियार कैसा है।

हमने भी कभी चाहा था एक ऐसे शख्स को; जो आइने से भी नाज़ुक था मगर था पत्थर का।

कहाँ तक सुनेगी रात कहाँ तक सुनाएंगे हम; शिकवे सारे सब आज तेरे रुबरु करें।

आवाज़ दी है तुमने कि धड़का है दिल मेरा; कुछ ख़ास फ़र्क़ तो नहीं दोनों सदाओं में।

अय दिल ये तूने कैसा रोग लिया; मैंने अपनों को भुलाकर एक गैर को अपना मान लिया!

दर्द के मिलने से ऐ यार बुरा क्यों माना; उस को कुछ और सिवा दीद के मंज़ूर न था।

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं; लोग अब मुझ को तेरे नाम से पहचानते हैं।

काश की खुदा ने दिल पत्थर के बनाये होते; तोड़ने वाले के हाथों में जख्म तो आए होते।

लौट आती है बेअसर मेरी माँगी हुई हर दुआ...
जाने कौन से आसमान पर मेरा खुदा रहता है।

सुना है आज उस की आँखों मे आसु आ गये
वो बच्चो को सिखा रही थी की मोहब्बत ऐसे लिखते है

इस जहान में कब किसी का दर्द अपनाते हैं लोग; रुख हवा का देखकर अक्सर बदल जाते हैं लोग।